Friday, 28 June 2013

Love Place

© SATYENDRA SINGH
'Love Place', 2008 (Mixed Medium)
Size - 11" x 15"

दोस्तों,
         लैला और मजनू में जैसे-जैसे प्यार बढ़ता है, वैसे-वैसे उन दोनों में एक-दूसरे से मिलने की चाहत और बढ़ती जाती है। घर में मिल नहीं सकते, जवान बच्चों पर सबकी नजर होती है, आस-पास के अड़ोसी-पड़ोसी भी टांक-झांक करते रहते है तो होटल में खर्च ज्यादा है, पार्क में लोगों की टेढ़ी नजर पड़ती रहती है, कुछ लोग उल्टे-पुल्टे कमेन्ट भी कर लेते हैं। जंगल में जा नहीं सकते क्योंकि वहां जंगली और आदम दोनों तरह के जानवरों का हमला करने का डर हमेंशा लगा रहता है। इसलिए अकसर देखा जाता है कि ऐसे जोड़े शादी की बड़ी जल्दी में रहते हैं।

        इसके उलट भवरों को भी आपने देखा होगा। इन्हें प्यार करने के लिए ज्यादा जगह की जरूरत नहीं होती। जहाँ भी कोई फूल मिला नहीं कि वे वहीं अपना ठिकाना बना लेते हैं।


Love Place (Mixed Medium on Paper)

Wednesday, 26 June 2013

LEAF-LOVE-LEAF

© SATYENDRA SINGH 
'Leaf-Love-Leaf', 2008 (pen & ink on paper)
Size - 11" x 15"


Leaf Love Leaf (Pen & Ink)


Tuesday, 25 June 2013

New Family

© SATYENDRA SINGH
'New Family', 2008 (pen & ink on paper)
Size - 11" x 15 

इस चित्र में एक छोटे से परिवार का एक छोटा सा चित्र बनाया गया है। चित्र को पेन और इंक की सहायता से कागज पर तैयार किया गया है।

New Family (Pen & Ink)




Friday, 21 June 2013

QUEEN TAJ

Ó SATYENDRA SINGH
'Queen Taj', 2006 (ball pen on paper)
Size - 11" x 15"


Queen Taj 
Friends! Have you seen such queen crown ?


Traditional Water Pipe


Ó SATYENDRA SINGH
'Traditional Water Pipe' (sketch pen on paper)
Size - 11" x 15"


Sketch pen with Ink
हमारे उत्तराखंड के ग्रामीण पहाड़ी इलाकों में पिछले कुछ वर्षों में एक बड़ा बदलाव आया है। जहाँ 15 से 20 वर्ष पहले गाँव के बुजुर्ग बांस से बने इस तरह के परम्परागत चिलम (स्थानीय भाषा में 'थ्वल्या') का उपयोग तम्बाकू पीने के  लिए करते थे। यह चिलम दादा जी के साथ हर समय रहता था, चाहे वे कहीं काम कर रहे हों या फिर खेत में हल जोतने गए हों। इसे वह खुद ही बांस को दो गांठ तक काटकर बनाते थे। तम्बाकू दो तरह का पिया जाता था। एक तो देसी, जो बाजार से खरीदा जाता था और दूसरा घरेलु तम्बाकू जिसे घर के खेत में उगाया एवं बनाया जाता था। इस समय गाँव के हर घर में चिलम-सजीला जरूर होता था और अतिथियों के घर आने पर भी सबसे पहले इसी की खोज होती थी, फिर चाय-पानी के लिए पूछा जाता था। इसी के साथ होती थी इधर-उधर की बातें और एक-दूसरे की सेवा पूछी जाती थी और बीच-बीच में एक-दो 27 नम्बर की बीड़ी भी पी जाती थी।
वहीं अब वक्त बदल गया है। अब कोई ही एक-दो बुजुर्ग गांवों में बचे होंगे। उनके बच्चे उनके लिए ये सब ब्यवस्था करते भी होंगे या नहीं भी। अब सिगरेट चलती है, वो भी नए-नए ब्रांड की, नहीं मिली तो बीड़ी से भी काम चल जाता है। शराब की तो पूछो मत ---- इसके बिना तो अच्छा से अच्छा खाना भी खासकर पुरुषों को तो हजम ही नहीं होता और उन्हें दो दिन खाना ना भी मिले तो वो खुश हैं अगर थोड़ी सी ये मिल जाये। 



BARAAT

Ó SATYENDRA SINGH
Baraat, 2006 (watercolour painting)
Size - 11" x 15"


On the trails of Uttarakhand, sometimes the sight of the procession in seen and the children of  the village are very happy to see the baraties (people involved in the procession).


Watercolour Painting

MOUTH POOL

Ó SATYENDRA SINGH
'Mouth Pool', 2003 (watercolor painting)
Size - 11" x 14"
Mouth Pool